मृदुला कुशवाहा
विकलांगता जीवन को हताश कर देता, चाहे वह व्यक्ति हो या औरत या छोटा बच्चा, सबको ही हीनभावना से ग्रसित कर देता है।
कभी कोई उसे बेचारा कहता है, तो कभी मजाक बनाता है.
हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने विकलांग को नया नाम देकर उनका सम्मान बढ़ा दिया है.
*दिव्यांग* का अर्थ है कि दिव्य शक्ति.
अक्सर देखा जाए तो दिव्यांग छात्र जब स्कूल जाता है, तब उसे हेय की दृष्टि से देखा जाता है, उन्हें प्रतिभा में कम आंका जाता है।
कभी कभी ये बच्चे मजाक का पात्र भी बन जाते हैं.
यदि किसी बच्चे की भाषा संबंधित दोष है, वह साफ नहीं बोल पाता है या तुलतुलाता या हकलाता है तो, उस बच्चे का जमकर मजाक बनाया जाता है, सभी लोग आवाज की नकल करेंगे.
शिक्षक भी ऐसे बच्चों को पढ़ाई में कमतर आंककर विशेष ध्यान नही देते हैं.
और ये बच्चे पढा़ई में पिछड़ जाते हैं.
इन बच्चों को एक समान शिक्षा का अधिकार, मान सम्मान दिया जाये तो, ये बच्चे भी किसी से कम नहीं साबित होंगे।
! रियो पैरा ओलंपिक खेल में दिव्यांगों ने ही ज्यादा मेडल जीतकर अपने भारत देश का नाम रोशन किया था!
इनका मनोबल ना गिराकर और बढ़ाया जाएं, हौसला बढ़ाया तो, इनके अंदर की छुपी हुई प्रतिभा उभर कर सामने आ जायेंगी।
पैर का टेढ़ापन भी बच्चों के लिए अभिषाप है, पहले माता पिता इतना ध्यान नही देते थे.
यदि बच्चे का पंजा टेढा़ है तो घर परिवार, समाज यही कहता है कि,! बच्चे को ग्रहण लग गया है!
और ये माँ को ही दोषी ठहरायेंगें.
यदि बच्चे को जन्म के बाद से ही सही इलाज मिल जाएं तो, यह भी सामान्य बच्चों की तरह जीने लगते हैं.
जन्मजात विकृतियाँ समय से यदि इलाज करवाया जाएं तो यह ठीक हो जाते हैं.
यदि हम भगवान का अभिषाप मानकर इलाज में लापरवाही करते है तो इन बेचारे को जिदंगी भर विकलांगता का दंश झेलना पड़ता है.
हम सबका फर्ज बनता है कि इनको भी पूरा सम्मान दे.
सरकार ट्रेनों और बसों में भी दिव्यांगों के लिए सीट आरक्षित किया है, और नौकरियों में भी.
इससे इनकी सहूलियत बढ़ी है, और ये भी आत्मनिर्भर बन रहे हैं.
हम सबको भी ट्रेनों या बसों या कही भी इनके सीट पर कब्जा ना बनाये, बल्कि इन्हें आराम से बैठने दे .
इन्हें विशेष आदर और सम्मान दे ।
मृदुला कुशवाहा
गोरखपुर
स्वरचित! विकलांगता!
विकलांगता जीवन को हताश कर देता, चाहे वह व्यक्ति हो या औरत या छोटा बच्चा, सबको ही हीनभावना से ग्रसित कर देता है।
कभी कोई उसे बेचारा कहता है, तो कभी मजाक बनाता है.
हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने विकलांग को नया नाम देकर उनका सम्मान बढ़ा दिया है.
*दिव्यांग* का अर्थ है कि दिव्य शक्ति.
अक्सर देखा जाए तो दिव्यांग छात्र जब स्कूल जाता है, तब उसे हेय की दृष्टि से देखा जाता है, उन्हें प्रतिभा में कम आंका जाता है।
कभी कभी ये बच्चे मजाक का पात्र भी बन जाते हैं.
यदि किसी बच्चे की भाषा संबंधित दोष है, वह साफ नहीं बोल पाता है या तुलतुलाता या हकलाता है तो, उस बच्चे का जमकर मजाक बनाया जाता है, सभी लोग आवाज की नकल करेंगे.
शिक्षक भी ऐसे बच्चों को पढ़ाई में कमतर आंककर विशेष ध्यान नही देते हैं.
और ये बच्चे पढा़ई में पिछड़ जाते हैं.
इन बच्चों को एक समान शिक्षा का अधिकार, मान सम्मान दिया जाये तो, ये बच्चे भी किसी से कम नहीं साबित होंगे।
! रियो पैरा ओलंपिक खेल में दिव्यांगों ने ही ज्यादा मेडल जीतकर अपने भारत देश का नाम रोशन किया था!
इनका मनोबल ना गिराकर और बढ़ाया जाएं, हौसला बढ़ाया तो, इनके अंदर की छुपी हुई प्रतिभा उभर कर सामने आ जायेंगी।
पैर का टेढ़ापन भी बच्चों के लिए अभिषाप है, पहले माता पिता इतना ध्यान नही देते थे.
यदि बच्चे का पंजा टेढा़ है तो घर परिवार, समाज यही कहता है कि,! बच्चे को ग्रहण लग गया है!
और ये माँ को ही दोषी ठहरायेंगें.
यदि बच्चे को जन्म के बाद से ही सही इलाज मिल जाएं तो, यह भी सामान्य बच्चों की तरह जीने लगते हैं.
जन्मजात विकृतियाँ समय से यदि इलाज करवाया जाएं तो यह ठीक हो जाते हैं.
यदि हम भगवान का अभिषाप मानकर इलाज में लापरवाही करते है तो इन बेचारे को जिदंगी भर विकलांगता का दंश झेलना पड़ता है.
हम सबका फर्ज बनता है कि इनको भी पूरा सम्मान दे.
सरकार ट्रेनों और बसों में भी दिव्यांगों के लिए सीट आरक्षित किया है, और नौकरियों में भी.
इससे इनकी सहूलियत बढ़ी है, और ये भी आत्मनिर्भर बन रहे हैं.
हम सबको भी ट्रेनों या बसों या कही भी इनके सीट पर कब्जा ना बनाये, बल्कि इन्हें आराम से बैठने दे .
इन्हें विशेष आदर और सम्मान दे ।
मृदुला कुशवाहा
गोरखपुर
स्वरचित